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अप्रवासी भारतीयों का संस्कृति, परंपराओं और धर्म से अटूट संबंध : स्वामी चिदानंद

ऋषिकेश। अप्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर परमार्थ त्रिवेणी पुष्प, अरैलघाट, प्रयागराज में एक अद्वितीय धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित आयोजन किया। इसमें लंदन से आए गरवी गुजरात पत्रिका के संपादक शैलेश भाई सोलंकी ने सपरिवार स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य में रूद्राक्ष के पौधों का रोपण किया।

इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं की महिमा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया के हर कोने में फैली हुई है। दुनियाभर के अप्रवासी भारतीयों का अपनी संस्कृति, परंपराओं और धर्म से अटूट संबंध है। भारतीय समाज हमेशा से ही अपनी विविधताओं और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है। भारत ने प्राचीन समय में विश्व को अद्भुत ज्ञान और विज्ञान प्रदान किया है और अपनी धार्मिकता, संस्कृति और परंपराओं से समृद्ध किया है। भारतीयों ने किसी भी जगह अपनी पहचान और संस्कृति को नहीं छोड़ा है। वह हर जगह अपने संस्कारों को साथ लेकर गए हैं। जब भारतीय अपने घर से बाहर निकलकर विदेशों में बसते हैं, तो उनका दिल और आत्मा अपनी मातृभूमि और उसकी सांस्कृतिक धारा से जुडा रहता है।

ज़ब भी वह अपने देश से बाहर जाते हैं, तो उन्हें नई जगहों पर अपने जीवन की शुरुआत करनी होती है। ऐसे में वे भौतिक रूप से अपने देश से दूर होते हैं, लेकिन उनकी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव सदैव बना रहता है। चाहे वे अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मध्य-पूर्व या अन्य किसी देश में बसे हों, वे अपने सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित रखते हैं और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण पहलूओं को अप्रवासी भारतीयों ने सहेज कर रखा है और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सजीव रखा है।

स्वामी चिदानंद ने कहा कि भारतीय भाषाओं एवं अपनी मातृभूमि का अप्रवासी भारतीयों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान हैं। चाहे वे हिंदी, गुजराती, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, बंगाली या कोई अन्य भाषा बोलते हों, अप्रवासी भारतीय अपनी मातृभाषा को बनाए रखने का प्रयास करते हैं। वे अपने बच्चों को भारतीय भाषाओं का ज्ञान देने के लिए विशेष प्रयास करते हैं, ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़ें रहें। अब समय मातृभूमि के लिए अपना योगदान देने का हैं।

लंदन से आए शैलेश भाई सोलंकी ने कहा कि भारतीय संस्कृति का प्रभाव न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी गहरा है। अप्रवासी भारतीय अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजते हुए न केवल अपने जीवन को समृद्ध बनाते हैं, बल्कि वे अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को भी यह धरोहर सौंपते हैं। वे केवल अपनी मातृभूमि से दूर हैं, परन्तु अपनी संस्कृति, परंपराओं और धर्म के साथ उनका गहरा संबंध है और इसमें पूज्य स्वामी जी और परमार्थ निकेतन जैसी संस्थाओं को अद्भुत योगदान है।

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