स्वामी चिदानंद ने उत्तराखंड के रैबार-6 ब्रांड कार्यक्रम में किया सहभाग
पहाड़ी संस्कृति एवं परंपराओं के संरक्षण का दिया संदेश
दिल्ली। उत्तराखंड के रैबार-6 ब्रांड के तहत मेल नामक एक विशिष्ट कार्यक्रम का दिल्ली में आयोजन किया गया। इसमें परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती, हरिद्वार के सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत और अन्य विशिष्ट अतिथियों ने सहभाग किया।
बता दें कि कार्यक्रम का उद्देश्य पहाड़ों की ओर लौटने, पहाड़ी संस्कृति, परंपराओं और उत्पादों को बढ़ावा देना है।कार्यक्रम में हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद, हिमालयन व्यंजन, पर्व और संस्कृति प्रदर्शनी लगाई गई। इस मेल के माध्यम से लोग पहाड़ों की ओर लौटने और उनकी समृद्ध विरासत को संजोने का संदेश प्राप्त करेंगे।
इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि उत्तराखंड की परंपराओं और संस्कृति को एक नई पहचान देना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में आधुनिकता और वैश्वीकरण की आंधी हमारे चारों ओर चल रही है, ऐसे में हमारी सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं को संजोना और उनका संरक्षण करना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की अनूठी परंपराएं और सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करना और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की परंपराएं और संस्कृति हमारी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यह न केवल हमारी ऐतिहासिक धरोहर को दर्शाती हैं बल्कि हमें हमारे मूल्यों और विश्वासों से भी जोड़ती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि हम अपनी परंपराओं और संस्कृति को भूल जाते हैं, तो हम अपनी जड़ों से कट जाएंगे, जो हमें कमजोर बना देगा।कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति में निहित पर्व, त्यौहार, नृत्य और संगीत हमारी जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा हैं। इन परंपराओं को जीवित रखना और उन्हें बढ़ावा देना न केवल हमारी संस्कृति को संरक्षित करेगा, बल्कि हमारी सामाजिक बुनियाद को भी मजबूत करेगा। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ने और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
स्वामी चिदानंद ने कहा कि इस पहल के माध्यम से उत्तराखंड की परंपराओं और संस्कृति को एक नई पहचान मिलेगी और इसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट किया जाएगा। सभी से अनुरोध है कि इस महत्वपूर्ण पहल में शामिल होकर इसका हिस्सा बनें और उत्तराखंड की संस्कृति को संजोने में योगदान दें।




