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अमेरिका के राजदूत केनेथ जूस्टर ने सपरिवार गंगा आरती में किया सहभाग

भारत और अमेरिका के उत्कृष्ट संबंधों पर की चर्चा

 

ऋषिकेश। संयुक्त राज्य अमेरिका के राजदूत केनेथ इयान जूस्टर ने सपरिवार परमार्थ निकेतन पहुंचकर परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती के सानिध्य में विश्व विख्यात गंगा आरती में सहभाग किया।

इस अवसर पर संयुक्त राज्य अमेरिका के राजदूत केनेथ इयान जूस्टर ने गंगा आरती में शामिल होकर आत्मिक शांति और आध्यात्मिकता के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि परमार्थ निकेतन की गंगा आरती विश्वभर में प्रसिद्ध है और हर दिन हज़ारों भक्तों और पर्यटकों को आकर्षित करती है। इस दौरान केनेथ इयान जूस्टर ने भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का सम्मान भी किया। इस मौके पर साध्वी भगवती सरस्वती ने केनेथ इयान जूस्टर को रचित सद्साहित्य भेंट किया। साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि यह साहित्य न केवल भारतीय आध्यात्मिकता और संस्कृति को प्रतिबिंबित करता है, बल्कि यह जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों और शिक्षाओं का भी अद्वितीय संग्रह है। वहीं, भारत और अमेरिका के उत्कृष्ट संबंधों पर भी चर्चा हुई। स्वामी चिदानन्द सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती ने राजदूत के साथ मिलकर दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग और साझेदारी को और अधिक मजबूत करने के विषय पर विचार-विमर्श किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि दोनों देश मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं और एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यह दौरा दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारतीय संस्कृति और परंपराएं विश्वभर में कितनी महत्वपूर्ण हैं। हम भारतीयों को गर्व है कि हम इसे पूरे विश्व के साथ साझा कर रहे हैं। यह समय भारत और अमेरिका के बीच मजबूत संबंधों को और प्रगाढ़ करने का है। हमें आशा है कि वर्तमान समय भारत व अमेरिका के संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करेगा। उन्होंने कहा कि परमार्थ निकेतन विश्वभर के लोगों के लिए एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का स्थल है। यह वह स्थान है, जहां लोग आकर शांति और आत्मिक उन्नति का अनुभव करते हैं। यह दौरा भारत और अमेरिका के बीच मजबूत संबंधों का एक नया अध्याय लिखेगा और दोनों देशों के बीच और अधिक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक सहयोग की उम्मीद करते हैं। इस दौरे से न केवल दोनों देशों के बीच आपसी समझ और सम्मान बढ़ेगा, बल्कि यह वैश्विक शांति और सामंजस्य की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

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